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इतिहास

डॉ. महेंद्र लाल सरकार द्वारा 29 जुलाई 1876 को स्थापित, आईएसीएस भारत का सबसे पुराना संस्थान है जो आधारभूत विज्ञान के अग्रणी क्षेत्रों में मूलभूत अनुसंधान के लिए समर्पित है। प्रोफेसर सी. वी. रमन ने 1907 से 1933 के दौरान आईएसीएस में कार्य किए थे, और यही वह स्थान है जहां उन्होंने अपने नाम से प्रसिद्ध प्रभाव की खोज की और जिसके लिए उन्हें 1930 में भौतिकी में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

 

 

आईएसीएस ओल्ड कैम्पस

आईएसीएस न्यू कैम्पस

 

शुरूआती वर्षों में एसोसिएशन की गतिविधियों को उदार जनता के सहयोग से 210 बउबाजार स्ट्रीट, कोलकाता में शुरू किया गया था। इसकी कल्पना और योजना उन्नीसवीं शताब्दी के बंगाल की सांस्कृतिक और बौद्धिक जागरण की पृष्ठभूमि में की गई थी और इसके संस्थापक की यह इच्छा थी कि यह एक ऐसी संस्था बने जो 'पूर्ण रूप से देशी और पूरी तरह से राष्ट्रीय' हो। इस संगठन का मूल उद्देश्य, जो आज भी जारी है, यहा तक कि इसके सभी विभागों में विज्ञान को बढ़ावा दिया जाए ताकि इसके विकास के लिए मूल अनुसंधान किया जा सके और जीवन की कलाओं और सुविधाओं में इसका विविध प्रयोग किया जा सके। प्रारंभिक चरण में, आईएसीएस में विज्ञान में व्याख्याताओं की सूची में युग की सभी प्रतिभाएं शामिल थेः फादर लाफोंट, जगदीश चंद्र बोस, आशुतोष मुखर्जी, चुनीलाल बोस और प्रमथ नाथ बोस। पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर और केशबचंद्र सेन आईएसीएस के पहले ट्रस्टी बोर्ड के सदस्यों में शामिल थे, डॉ. सरकार स्वयं पहले मानद सचिव थे। इन महान् विद्वानों के अलावा गुरुदास बनर्जी, राजेंद्रलाल मित्र और सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे महापुरुष इसके संरक्षक थे। राजा पियरी मोहन मुखर्जी 1912 में आईएसीएस के अध्यक्ष का पद संभालने वाले पहले भारतीय थे। उनके अन्य विशिष्ट उत्तराधिकारी डॉ. निलरत्न सरकार, ज्ञानचंद्र घोष और सत्येंद्र नाथ बोस रहे हैं।

 

आईएसीएस ने 1907 में सी. वी. रमन के आगमन के साथ एक नए चरण में प्रवेश किया। उन्होंने आईएसीएस में अंशकालिक कार्यकर्ता के रूप में महत्वपूर्ण अनुसंधान कार्य आरंभ किया और साथ ही, डॉ. सरकार के पुत्र एवं आईएसीएस के तत्कालीन सचिव डॉ. अमृत लाल सरकार के प्रेरक नेतृत्व में कलकता में महालेखाकार कार्यालय में अपने कार्य का निर्वाह किया। बाकी तो इतिहास ही रहा। प्रसिद्ध रमन प्रभाव की खोज 1928 में की गई थी, जिसके परिणामस्वरूप रमन को 1930 में भौतिकी में नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ। रमन ने एक जीवंत अनुसंधान स्कूल की शुरुआत की, जिसने कुछ प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को आकर्षित किया, जिन्होंने रमन के साथ-साथ अनुसंधान की प्रगति को आगे बढ़ाया। रमन के प्रस्थान के बाद के. एस. कृष्णन ने आधुनिक चुंबकत्व और संरचनात्मक भौतिकी के क्षेत्र में अग्रणी स्कूल की शुरुआत की। के. बनर्जी ने क्रिस्टलोग्राफी की प्रत्यक्ष विधि के प्रारंभिक विकास का बीड़ा उठाया।

 

इस सदी के शुरुआती दशकों तक एसोसिएशन भारत में एकमात्र ऐसा स्थान था जहां भौतिक विज्ञान में उच्च शोध किया जा सकता था। नतीजतन, पूरे भारत के छात्र एसोसिएशन के रचनात्मक माहौल में काम करने के लिए कलकत्ता में इकट्ठा होने लगे। आधुनिक भारत के कई प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने यहां शोध किया था। एस भागवंतम, एल श्रीवास्तव, एन के सेठी, सी प्रसाद, एम एन साहा और कई अन्य प्रख्यात भारतीय वैज्ञानिकों ने एसोसिएशन की अनुसंधान संस्कृति को समृद्ध करने के लिए यहां काम किया।